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Chhattisgarhi satire news छत्तीसगढ़ी व्यंग समाचार- एक अपराध, सौ घर के चूल्हा ! न्याय के चक्की म पिसाथे जनता, अउ हर मोड़ म खुलथे कमई के दुकान ! थाना ले जेल तक, जनता के जेब कैसे हो थे खाली

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छत्तीसगढ़ी व्यंग समाचार 

एक अपराध, सौ घर के चूल्हा !
न्याय के चक्की म पिसाथे जनता, अउ हर मोड़ म खुलथे कमई के दुकान !

विशेष व्यंग रिपोर्ट — थाना ले जेल तक, जनता के जेब के पोस्टमार्टम !

रूपानंद  सोई - 94242-43631 

हमर देश के न्याय व्यवस्था अइसने अद्भुत व्यवस्था आय, जिहां एक ठन अपराध दर्ज होवत ले कतको मनखे के गृहस्थी के गाड़ी धकाधक चले लगथे। आरोपी के अपराध साबित होय या नइ होय, फेर ओखर मामला म कतको झन के रोजी-रोटी के इंतजाम जरूर हो जथे!

अब देखव, एक ठन केस के कमाल! एक तरफ पीड़ित न्याय के आस म भटकत रहिथे, दूसर तरफ आरोपी के परिवार अपन जेब के तेल निकालत रहिथे। अउ बीच म चलथे तारीख, पेशी, जमानत अउ खर्चा के अंतहीन पिक्चर!

1. थाना म रिपोर्ट लिखाय के पहिली किस्त!
पीड़ित थाना पहुंचथे न्याय के आस ले। फेर कुछ मामला म रिपोर्ट लिखे के पहिली ही कानून के दुकान म मोलभाव शुरू हो जथे।
हवलदार साहब कहिथें—
“देखव भई, आरोपी के खिलाफ कड़ा-कड़ा धारा लगाना हे, मामला ल मजबूत बनाना हे... कुछ व्यवस्था करव!”
पीड़ित सोचथे— “मोला तो न्याय चाही, फेर इहां तो न्याय के पहिली जेब के परीक्षा होवत हे!”
अउ व्यंग के असली मोड़ तो तब आथे, जब आरोप हे कि उही पुलिस वाला आरोपी पक्ष ल अलग ले समझाथे—
“देख लेव जी, अइसन धारा लगाहूं कि जमानत के रद्दी कागज बन जाही... अउ कुछ धारा अइसन घलो रहिथे कि जमानत के रद्दी कागज नई, जमानत के टिकट बन जाही!”
अब पीड़ित ले अलग, आरोपी ले अलग! कानून के तराजू म न्याय कतका तौले जावत हे, ये तो जांच के बात आय; फेर जनता के जेब जरूर दुनो तरफ ले हल्का होवत जाथे!

2. वकील साहब के फीस अउ तारीख के किस्त!
आरोपी के परिवार अब कोर्ट के चक्कर काटथे। वकील साहब के दरवाजा खटखटाथे।
वकील साहब फाइल ल उलट-पलट के कहिथें—
“देखव, मामला गंभीर हे। जमानत कराना हे त मेहनत लगही, तैयारी लगही, फीस लगही!”
परिवार कहिथे— “साहब, जमानत जल्दी हो सकही का?”
वकील साहब कहिथें— “कोशिश तो पूरा करबो, बाकी फैसला कोर्ट के हाथ म हे!”
इहां एक बात साफ हे— ईमानदारी ले काम करे वाले वकील मन घलो हें, फेर जे मामला म हर कदम म खर्चा के नवा अध्याय खुलथे, ओमा गरीब परिवार के हालत खराब हो जथे।
अब परिवार थाना जाथे— “साहब, चालान जल्दी पेश कर देवव, जमानत के प्रक्रिया आगू बढ़ही।”
फेर चालान के रफ्तार घलो कभू-कभू अइसन रहिथे, जइसे सरकारी दफ्तर के पंखा— आवाज बहुत करथे, हवा कम देथे!

3. चालान के फोटोकॉपी अउ कमई के मशीन!
चालान पेश होवत हे। अब कागज-पत्तर, फोटोकॉपी, दस्तावेज अउ न जाने का-का!
जनता सोचथे— “कागज तो दस पन्ना के हे, खर्चा हजार पन्ना जइसन काबर लागत हे?”
फोटोकॉपी दुकान वाला कहिथे— “साहब, हमर घलो घर-परिवार हे!”

बिल्कुल भई, ओकरो गृहस्थी चलना चाही। होटल वाला, ऑटो वाला, चाय वाला— सबके गृहस्थी चलना चाही। सवाल सिरिफ एतीक हे कि एक आरोपी के केस म कमई के मेला लगही, त पीड़ित अउ आरोपी के परिवार अपन घर कइसे चलाही?

4. कोर्ट के बाबू अउ वो रहस्यमयी रकम!
अब पहुंच गे कोर्ट। जज साहब अपन जगह म बइठे हें। बाजू म बाबू साहब के टेबल हे।
परिजन के कान म वकील साहब धीरे ले कहिथें—
“बाबू  ले मिल लेव, कुछ खर्चा-पानी दे देव... काम आसान हो जाही!”
परिजन के मन म सवाल उठथे— “ये पैसा आखिर काकर बर? कऊन नियम म? कऊन रसीद म? अउ कऊन मद म?”
फेर सवाल पूछे के हिम्मत हर कोनो म कहां होथे!
अइसने आरोप अगर कहीं सच म होवत हे, त जांच होय, कार्रवाई होय। काबर कि सरकारी दफ्तर के काम बर अगर सरकारी फीस तय हे, त ओकर रसीद घलो मिलना चाही।
न्याय के मंदिर म अगर बिना रसीद के चढ़ावा चढ़े लगही, त आम जनता पूछही— ये पूजा आय कि वसूली के योजना?

5. पेशी के बाद चाय कम, नाश्ता ज्यादा !
पेशी निपटिस। अब वकील साहब ल संग ले होटल म चाय पीये जाथे।
नाम रहिथे— “चलव, एक कप चाय पी लेथन!”
फेर टेबल म चाय के संग समोसा, कचौरी, पोहा अउ न जाने का-का आ जथे।
चाय वाला मन म सोचथे— “आज फेर कानून के लंबा तारीख ले हमर दुकान के बिक्री बढ़ गे!”
बात हंसी के लगथे, फेर असल बात ये आय कि मामला म फंसे परिवार बर हर चाय, हर नाश्ता अउ हर सफर घलो खर्चा के नवा बोझ बन जथे।

6. बस, ऑटो अउ पेट्रोल के घलो जमानत !
थाना जावव, कोर्ट जावव, वकील के दफ्तर जावव, जेल जावव— कभू बस, कभू ऑटो, कभू मोटरसाइकिल, कभू कार!
आरोपी के परिवार के हालत अइसन हो जथे कि एक दिन परिवार के मुखिया हिसाब लगाथे—
“केस म कतका खर्चा होइस, ये तो बाद म गिनबो... पहिली ये बतावव कि घर पहुंचय बर किराया बांचे हे कि नइ?”
केस के तारीख बढ़थे, खर्चा बढ़थे, उधारी बढ़थे... अउ घर के राशन के डब्बा धीरे-धीरे खाली होवत जाथे!

7. निचली अदालत म जमानत खारिज, अब ऊंची अदालत के चढ़ई !
निचली अदालत ले जमानत नइ मिलिस, अब उच्च अदालत के रद्दा धरना पड़ही।
नवा वकील, नवा फीस, नवा कागज, नवा सफर, नवा खर्चा!
परिवार सोचथे— “जमानत के आदेश मिलही तब चैन के सांस लेबो।”
फेर न्याय के रद्दा म चलत-चलत कभू-कभू अइसन हालत हो जथे कि परिवार के आधा कमई वकील फीस म, आधा आना-जाना म, अउ बचे खुचे उधारी चुकाय म निकल जथे।
आरोपी जेल म बंद हे, फेर ओकर पूरा परिवार आर्थिक सजा भुगतत रहिथे!

8. जेल के बाहिर दुकान, भीतर अलग संसार !
अब परिवार जेल म मुलाकात करे जाथे। बाहिर ले टमाटर, मिरचा, बिस्कुट, कपड़ा, साबुन, तेल, ब्रश, जीभ साफ करे के सामान, टूथपेस्ट— न जाने का-का ले जाथे।
जेल के बाहिर के दुकानदार मन के बिक्री बढ़थे। ये घलो एक किसम के बाजार आय।
फेर यदि सामान ले जाय, मुलाकात करे या नियम के भीतर सुविधा पाय बर कहीं अवैध पैसा मांगे के शिकायत आवत हे, त ओकर जांच होय के चाही।
जेल के भीतर घलो बैरक के दुनिया अलग बताय जाथे। आरोप लगथे कि कहीं-कहीं बैरक के दबदबा रखइया कैदी मन घलो सोये के जगह, पंखा के नीचे के कोना या दूसर सुविधा के नाम म वसूली करथें।
अब सोचव— बाहर परिवार वकील के फीस जुटावत हे, भीतर आदमी अपन सिर ढके बर जगह खोजत हे!
बाहर तारीख के टेंशन, भीतर बैरक के टेंशन... अउ दुनो के बीच म जनता के जेब के ऑपरेशन!

9. एक केस, कतका घर के चूल्हा ?
चलव, अब गिनती करथन— रिपोर्ट लिखे के खर्चा के आरोप, वकील के फीस, कागज-पत्तर, फोटोकॉपी, कोर्ट आना-जाना, चाय-नाश्ता, जमानत के कोशिश, उच्च अदालत के खर्चा, जेल मुलाकात अउ रोजमर्रा के सामान!
एक मामला म कतको दुकान के बिक्री बढ़ सकथे, कतको मनखे के कमई हो सकथे। ये सब सेवा अपन-अपन जगह म जरूरी घलो हो सकथे। फेर जिहां वैध फीस के जगह अवैध वसूली घुस जाथे, उहां न्याय के प्रक्रिया आम आदमी बर बोझ बन जाथे।
असली सवाल ये नो हे कि कतका मनखे के गृहस्थी चलत हे; असली सवाल ये आय कि न्याय पाय बर जनता ल अपन गृहस्थी काबर उजाड़े बर पड़त हे?

आखिरी बात — जनता के सवाल !
हमर संविधान सब्बो ल न्याय के अधिकार देथे। कानून के काम आय अपराध के जांच करना, दोषी ल सजा दिलाना अउ निर्दोष के अधिकार के रक्षा करना।
न्याय बिकना नइ चाही, न्याय मिलना चाही!
थाना म रिपोर्ट लिखाय बर डर नइ होना चाही। कोर्ट म हर कदम के फीस साफ होना चाही। जमानत के फैसला कानून अउ सबूत के आधार म होना चाही। जेल म सुरक्षा अउ बुनियादी सुविधा नियम के मुताबिक मिलना चाही।
अउ जिहां रिश्वतखोरी या अवैध वसूली के शिकायत हे, उहां निष्पक्ष जांच अउ कार्रवाई होना चाही।
काबर कि गरीब आदमी जब न्याय मांगे बर निकलथे, त वो अपन घर के सुख-चैन गिरवी रखके निकलथे।
अउ अगर न्याय के रद्दा म हर मोड़ म नवा खर्चा खड़े हो जाही, त जनता एक दिन पूछही—
“साहब! अपराध हमन देखेन, सजा आरोपी भोगत हे... फेर जेब हमर पूरा परिवार के काबर कटत हे?”

— व्यंग के तीर व्यवस्था के खामी ऊपर हे, हर पुलिसवाला, वकील, बाबू या जेलकर्मी ऊपर नई। ईमानदारी ले सेवा करेइया मनखे मन के सम्मान बने रहना चाही।

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