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😂 व्यंग्य खबर | गजब हे हमर पिथौरा ! पिथौरा के मछरी बाजार म मचा हड़कंप ! भाव पूछइया के भीड़, कोतरी लूटइया के होड़ अउ साहब के वीआईपी ठाठ !


पिथौरा के मछरी बाजार म मचा हड़कंप! भाव पूछइया के भीड़, कोतरी लूटइया के होड़ अउ साहब के वीआईपी ठाठ !

😂 व्यंग्य खबर | गजब हे हमर पिथौरा !

रूपानंद सोई , पिथौरा -94242-43631 

छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिला के पिथौरा! नाम छोटे कस्बा के, लेकिन किस्सा अइसन-अइसन कि बड़े-बड़े शहर के राजनीति, नौकरशाही अउ बाजार के रंग फीका पड़ जावय! इहां के जनता किसान, मजदूर, व्यापारी, नौकरीपेशा अउ मेहनतकश मनखे हें। दिनभर सब अपन-अपन काम म खटथे, लेकिन जइसे ही बिहान होथे, नगर के खेल मैदान के आसपास जिनगी के असली खेल शुरू हो जाथे!

एक कोती मैदान म युवा मन अपन खेल-कूद म पसीना बहाथें, त दूसर कोती सब्जी बाजार म गृहस्थी चलाय के जुगाड़ भिड़ाथें। झोला धरके निकरे गृहस्थी वाले पहिली पूरा बाजार के चक्कर काटथें, हर दुकान म भाव पूछथें, सब्जी ला अइसन जांचथें जइसे खरीदी नइ, कोनो सरकारी टेंडर भरत होवंय!

भाव पूछना मुफ्त हे, खरीदी करना जेब के औकात के बात हे !

बाजार के एक कोना म सब्जी के भाव-ताव चलथे, त दूसर कोना म नगर के नामी-गिरामी मनखे मन के दरबार लगथे। हंसी-मजाक, राजनीति के चर्चा, नेता मन के गुणगान अउ अफसर मन के किस्सा—सब कुछ एके जगह! चाय भले बाद म मिलय, लेकिन चर्चा के गरमी बिहान ले ही चढ़े रहिथे।

प्रधान जी के एक ऐलान अउ बाजार म मच गे भगदड़ !

एही बीच प्रधान जी के आगमन होथे। प्रधान जी के चेहरा म अइसन चमक, जइसे कोनो गुप्त सरकारी योजना के लाभार्थी सूची अभी-अभी हाथ लग गे होय !

आवत ही फरमाथें—

🐟 अरे भइया ! आज बार चौक म जबरदस्त मछरी मिलत हे ! बामी, ठुरू, टेंगना अउ नान-नान कोतरी ! जल्दी जावव, मौका हाथ ले निकल जाही !

बस फेर का! प्रधान जी के मुंह ले मछरी के नाम निकलिस अउ बाजार के पूरा माहौल बदल गे। जेन मन राजनीति के गंभीर चर्चा म डूबे रहिन, वो मन अचानक मत्स्य विभाग के विशेषज्ञ बन गिन। सबके कदम बार चौक के डहर! अइसन दौड़ मारे गिन, मानो मछरी नइ मिलही त प्रदेश के विकास रुक जाही!

बार चौक पहुंचते ही मछरी दुकान म भीड़ के बाढ़ आ गे। लेकिन इहां एक अलग किसम के ग्राहक दिखिन। आधा भीड़ मछरी खरीदे बर नइ, भाव पूछके अपन आर्थिक स्थिति के पोस्टमार्टम कराय बर पहुंचे रहिस !

कोई पूछथे—“बामी कतका पाव?”

मछरी वाला कहिथे—“डेढ़ सौ रुपिया पाव!”

ग्राहक के चेहरा अइसन उतर जाथे, जइसे बैंक खाते म मिनिमम बैलेंस के नोटिस आ गे होय!

कोई पूछथे—“टेंगना अउ ठुरू?”

जवाब मिलथे—“सौ रुपिया पाव!”

फेर ग्राहक मन के मन म एके सवाल—मछरी खावंय कि महंगाई के आंसू पियंवय?

भाव पूछे बर भीड़ हजार, खरीदे बर जेब म दमदार चाही !

कोतरी बिकिस फटाफट, बाकी मछरी के भाव देखके जनता हो गे साफ !

अब बात आथे नान-नान कोतरी के। ये कोतरी मन के कीमत भले छोटे होय, लेकिन मांग म पूरा दम! पिथौरा गार्डन के पीछू शरबत पानी के जुगाड़ म लगे कुछ लोग मन के नजर जइसे ही कोतरी ऊपर पड़िस, फेर का! देखते-देखते कोतरी के पूरा स्टॉक सफाचट!

जेन मन के जेब बामी अउ टेंगना के भाव सुनके कांप गे रहिस, वो मन कोतरी म अपन उम्मीद के आखिरी सहारा खोज लिन।

कोतरी बिक गे, ग्राहक निपट गिन, लेकिन बामी, टेंगना अउ ठुरू अब भी दुकान म अपन खरीदार के बाट जोहत रहिन।

अब मैदान म उतरिन वो मन, जिकेर जेब के वजन बाजार के आम जनता ले कुछ जादा भारी रहिथे!

👑 साहब के आगमन ! बाजार म मछरी कम, प्रोटोकॉल जादा !

अचानक बाजार म गुरुजी, नेता मन अउ दबंग अंदाज म चलइया पुलिस साहब के आगमन होथे। बस फेर का! जेन मन अभी तक मछरी के भाव सुनके दुकान ले खिसक जात रहिन, वो मन अचानक किनारा पकड़ लेथें।

आवाज गूंजथे—

“अरे भाई, साहब आय हें! पहिली साहब ला दो!”

मछरी वाला घलो तुरंत सेवा-भाव म आ जाथे। आम ग्राहक के बेरा म जिहां भाव के पूरा हिसाब-किताब होवत रहिस, उहां साहब के बेरा म प्राथमिकता के पहिया तेजी ले घूमे लगथे!

साहब के चेहरा म मुस्कान खिल जाथे। आखिर बाजार म इज्जत मिलना कोनो छोटी बात थोड़े न हे! नेता मन मुस्कुराथें, गुरुजी मन मुस्कुराथें, मछरी वाला घलो खुश अउ आसपास खड़े लोग मन अपन-अपन समझ के हिसाब लगाथें।

कोनो कुछ बोलत नइ, लेकिन माहौल खुदे सवाल पूछथे —

का मछरी के भाव सब्बो बर एके हे, या ओह भी आदमी के पद अउ पहचान देखके बिकथे ?

अब ये बात जरूरी नइ कि साहब मन बिना पैसा दे मछरी लेथें या नियम तोड़थें। बात तो बस एतके हे कि बाजार म सम्मान के कतार कई बेर जेब, पहचान अउ रुतबा के हिसाब ले बदलत दिखथे!

🎭 झोलटूराम के तगड़ा तंज !

मोर पिथौरा के हाल घलो गजब हे भइया !

किसान दिनभर खेत म पसीना बहाथे, मजदूर मेहनत करके घर चलाथे, गृहस्थी वाला दस दुकान घूमके पांच रुपिया बचाथे। आम आदमी मछरी के भाव पूछके लौट जाथे, काबर कि घर के बजट घलो कोनो मंत्री के बजट नइ हे कि घाटा होही त दूसर मद ले पूरा कर लेही!

अउ बाजार म जेन मन के नाम, पद अउ पहचान चलथे, तिनकर स्वागत-सत्कार के अलग रंग दिख जाथे।

इहां मछरी के दुकान म तीन किसम के ग्राहक मिलथें—

पहिली, भाव पूछइया! जेन मन मछरी के दाम सुनके अपन सपना ला झोला म रखके घर लौट जाथें।

दूसरी, कोतरी झपटइया! जेन मन मौका मिलते ही अपन जरूरत पूरा कर लेथें।

तीसरी, रुतबा संग पहुंचइया! जेन मन के आगमन ले बाजार म रास्ता घलो खुल जाथे अउ मुस्कान घलो चौड़ा हो जाथे!

मोर सवाल ए नइ हे कि साहब मछरी खावंय काबर? नेता मछरी खरीदंय काबर? गुरुजी मछरी खावंय काबर? अरे भइया, मछरी तो सबके पसंद हो सकथे! सवाल तो बस ए हे कि आम आदमी के बेरा म नियम, भाव अउ इंतजार; अउ खास आदमी के बेरा म सम्मान, प्राथमिकता अउ मुस्कान—ए अंतर आखिर काबर?

😂 आखिरी बात — गजब हे हमर पिथौरा !

पिथौरा के बिहान म खेल मैदान म खेल होथे, सब्जी बाजार म मोलभाव होथे, चौराहा म राजनीति होथे अउ मछरी बाजार म समाज के असली चेहरा दिखथे!

इहां झोला सबके हाथ म हे, लेकिन झोला भरके घर ले जाय के ताकत सबके एके जइसन नइ हे। कोनो भाव पूछके संतोष करथे, कोनो कोतरी लेके खुश होथे, त कोनो बामी-टेंगना के संग अपन रुतबा के मुस्कान घलो ले जाथे !

झोलटूराम के आखिरी मन के बात—

“भइया, मछरी के कांटा ले बचना आसान हे, लेकिन समाज म पद अउ प्रतिष्ठा के कांटा ले बचना बड़े मुश्किल! बाजार म मछरी तौलइया तराजू सबके वजन बता सकथे, लेकिन आदमी के असली वजन ओकर पद नइ, ओकर व्यवहार बताथे!”

बाकी पिथौरा के माटी, पिथौरा के मनखे अउ पिथौरा के अंदाज—सब्बो लाजवाब !

— झोलटूराम के मन के बात,  जनहित में जारी  😜

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