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| प्रतीकात्मक तस्वीर |
मंदिर म माई बर चुनरी, मोबाइल म स्टेटस…अउ जनम देवया बूढ़ी दाई घर म अकेल्ला !
नवरात म दुर्गा दाई के पूजा करे बर लाइन, फेर जनम देइया दाई के दवाई बर टेंशन !
रूपानंद सोई - 94242-43631
अरे वाह रे कलजुग के भक्त मन ! जय माता दी के जयकारा घलो अउ घर म बूढ़ी दाई के हाल-बेहाल घलो !
हर साल के जम्मो नवरात कस ए साल घलो पूरा भारत म नवरात के धूम मचे हे। कोनो घर म जोत जलत हे, कोनो मंदिर म नरियर फूटत हे, तो कोनो माता रानी ला फल, मिठाई अउ तरह-तरह के भोग चढ़ावत हे। भक्त मन के मन म एकेच अरजी हे—हे माता रानी! हमर घर म सुख-समृद्धि बने रहय, कारोबार म बरकत आवय, बाल-बच्चा मन खुश रहंय अउ परिवार म शांति रहय।
बात घलो सही हे! पूजा-पाठ होय, भक्ति-भाव होय, मन ला शांति मिलय अउ घर-परिवार म सुख बने रहय। फेर ददा, एक ठन सवाल घलो हे—जेन घर म जनम देइया दाई के आंखी म आंसू हे, ओ घर म माता रानी के पूजा के असली मतलब का हे?
मंदिर वाली दाई ला मेवा-मिठाई, घर वाली दाई ला नइ मिल थे दवाई !
जेन दाई अपन कोख म नौ महीना तक रखिस, पीरा सहिस, जनम दिस, अपन खून-पसीना एक करके पाले-पोसे, खुद भूखा रहिके अपन लइका के पेट भरिस, खुद गीला बिस्तर म सुतिस अउ अपन लइका ला सूखा जगह म सुलाइस—आज ओही दाई बुढ़ापा म अपन लइका के रद्दा देखत बइठे हे।
लइका बड़े होइस, पढ़-लिख के नौकरी धरिस, कोनो बिजनेस म जम गिस, शहर म बड़े मकान बना लिस, गाड़ी खरीद लिस, परिवार संग घूमे बर बढ़िया-बढ़िया जगह खोज लिस। फेर जेन दाई के आंचल धरके दुनिया देखिस, ओही दाई ला घर म अकेल्ला छोड़ दिस।
अउ कमाल देखव! नवरात आवत हे त बेटा अपन मेहरारू अउ लइका मन ला लेके मंदिर जाथे। माता रानी के आगू माथा टेकथे, बढ़िया फोटो खिंचवाथे अउ मोबाइल म स्टेटस डालथे—
“मां के दरबार म हाजिरी… जय माता दी!” 🙏🚩
फोटो म पूरा परिवार मुस्कुरावत दिखथे। स्टेटस देखके लोगन मन घलो वाह-वाह करथें—“वाह! का संस्कारी परिवार हे!”
फेर ददा, काश! ओ स्टेटस म घर म अकेल्ला बइठे बूढ़ी दाई के फोटो घलो रहितिस। काश! ओमा ये घलो लिखे रहितिस—“जेन दाई मोला जनम दिस, आज ओही दाई के दवाई के बेरा आय हे!”
माता के दरबार म हजारों के चढ़ावा, घर म दाई के दवाई बर बहाना !
सबले बड़े विडंबना तो ये हे कि कुछ घर म माता रानी बर महंगा-महंगा फल, मिठाई अउ चढ़ावा के कमी नइ होवय। मंदिर म चंदा देय बर हाथ तुरते खुल जाथे, भंडारा कराय बर मन ललचाथे, धार्मिक आयोजन म बढ़-चढ़ के हिस्सा लेथें।
फेर घर म बूढ़ी दाई कहिथे—“बेटा, मोर दवाई खतम हो गे हे, ले आतेस का?”
त जवाब मिलथे—“अभी काम म हंव दाई, बाद म ले आहूं !”
ओ ‘बाद म’ कब आही, ए बात के भरोसा दाई ला घलो नइ रहय। कभू पइसा के बहाना, कभू बेरा के बहाना, तो कभू अपन जिनगी के भाग-दौड़ के बहाना !
माता रानी बर सोना-चांदी के मुकुट, अउ जनम देइया दाई बर एक पत्ता दवाई घलो भारी पड़ जाथे का ?
अउ ए सबो के बाद घलो ओ बूढ़ी दाई पड़ोसी मन के आगू अपन बेटा के तारीफ करत नइ थकय—“मोर बेटा बहुत अच्छा हे, मोर बहू बहुत बढ़िया हे, मोला काबर छोड़ही?”
भीतर ले टूटत रहिथे, फेर अपन लइका के इज्जत बचाय बर अपन दुख ला मुस्कान के पाछू लुकावत रहिथे। ए दाई के ममता ला का कहिबे! जेन लइका के गलती ला दुनिया के आगू नइ बताय, ओही लइका कभू-कभू दाई के पीरा ला समझे के कोशिश तक नइ करय।
मोबाइल म भक्ति के प्रदर्शन, जिनगी म सेवा के अकाल !
आजकल भक्ति के घलो अजब हिसाब हो गे हे। मंदिर म कतका बेर गिस, कतका बड़े प्रसाद चढ़ाइस, कतका सुंदर फोटो खिंचाइस अउ सोशल मीडिया म कतका लाइक मिलिस—एखर हिसाब तो सब रखथें।
फेर दाई के दवाई कतका दिन ले नइ आइस, दाई ला कतका दिन ले अपन लइका के संग बइठके बात करे के मौका नइ मिलिस, दाई के मन कतका दिन ले अकेल्ला हे—एखर हिसाब रखे वाला कोनो नइ !
ये बात सबो बेटा-बेटी बर नइ हे। बहुत झन अपन बूढ़े मां-बाप के सेवा करथें, दूर रहिके घलो हालचाल पूछथें, दवाई-पानी के इंतजाम करथें अउ अपन जिम्मेदारी निभाथें। फेर जेन मन अपन जिम्मेदारी ले मुंह मोड़ लेथें, ओ मन ला ए आईना जरूर देखना चाही।
काबर कि पूजा के फोटो दुनिया ला दिखाथे, फेर दाई के सेवा हमर संस्कार ला दिखाथे।
नवरात के असली संदेश : पहिली घर के दाई के आंसू पोछव !
माता दुर्गा के पूजा जरूर करव, जोत जलावव, कन्या भोज करव, गरीब मन के मदद करव अउ अपन आस्था ला पूरा मन ले निभावव। फेर एखर संग अपन घर के बूढ़े मां-बाप के हालचाल घलो पूछव।
दाई ला बेरा म दवाई देवव, ओकर संग दू मिनट बइठके गोठियावव, ओकर मन के बात सुनव। ओकर जरूरत ला बोझ झन समझव। जेन हाथ तुमन ला चलना सिखाइस, आज ओ हाथ ला सहारा के जरूरत हे।
काबर कि बुढ़ापा म मां-बाप ला महंगा उपहार ले जियादा अपन लइका के संग, सम्मान अउ अपनापन के जरूरत होथे।
अउ सुनव भक्त मन! माता रानी के दरबार म माथा टेकना बढ़िया बात आय, फेर घर म बइठे जनम देइया दाई के माथा म मया के हाथ फेरना घलो कम पूजा नइ आय।
आखिरी गोठ, सीधा दिल म लागही!
मंदिर म मां दुर्गा के आगू हाथ जोड़के सुख मांगे के पहिली, घर म बइठे अपन दाई के दुख जरूर पूछव।
काबर कि जेन दाई अपन पूरा जिनगी अपन लइका के सुख बर समर्पित कर दिस, ओही दाई अपन आखिरी बेरा म अपन लइका के दू मीठ गोठ, दू घूंट पानी अउ बेरा म दवाई के आस लगाके बइठे रहिथे।
याद रखव—माता रानी के पूजा म श्रद्धा जरूरी हे, अउ जनम देइया दाई के सेवा म इंसानियत। मंदिर के घंटी बजावव, जरूर बजावव… फेर घर म बूढ़ी दाई के मन घलो सुनव।
नइ तो दुनिया कहिही—“जय माता दी” के स्टेटस तो रोज लगथे, फेर घर के दाई के पीरा ला समझे बर आखिर बेरा कब मिलही?”

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