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Latest Chhattisgarh News : पिथौरा म जमीन के खेला ! कागज म किसान के हक, अउ सेटिंग वालों के जेब म नोट ही नोट ! तालाब घलो बिके लगही त मछरी मन घलो पूछहीं—“हमर अगला ठिकाना कति मेर रही, पटवारी साहब ? पानी म रहिबो कि रजिस्ट्री ऑफिस म ?”


 


पिथौरा म जमीन के खेला ! कागज म किसान के हक, अउ सेटिंग वालों के जेब म नोट ही नोट  !
पटवारी के कलम चलिस, सरकारी जमीन के रंग बदलिस ! जनता पूछत हे—ये राजस्व विभाग आय कि जमीन बेचइया दुकान ?

पिथौरा। इहाँ जमीन के कारोबार के चर्चा अइसन गरम रहिथे, जइसे चूल्हा म चढ़े रहय झनझनावत टमाटर के चटनी ! किसान अपन पुरखा के जमीन बर तहसील-अफिस के चक्कर काटत रहिथे, अउ जमीन के कागज म कइसे-कइसे खेला हो जाथे, ये बात समझत-समझत सबों झन के माथा घूम जाथे।

साल 1978 म शासन ह किसान मन ला काबिल कास्त बर जमीन दे रहिस। अब सवाल ये उठत हे कि जेन जमीन किसान के हक म मिले रहिस, वो दूसर मन के नाम म कइसे चढ़ गे? पट्टा किसान के, अउ कागज म खेला करे के कला,   एतका जबरदस्त कि अच्छे-अच्छे पढ़े-लिखे मन घलो माथा पकड़े रहि जाथे !

अउ मामला इहीं तक नइ रुकय। आरोप अइसने घलो लगत हें कि जमीन के रिकॉर्ड म हेरफेर करके सरकारी तालाब,  तक ला बेच डारे के खेला होवत हे। अब भइया, तालाब घलो बिके लगही त मछरी मन घलो पूछहीं—“हमर अगला ठिकाना कति मेर रही, पटवारी साहब ? पानी म रहिबो कि रजिस्ट्री ऑफिस म ?”

109 आदिवासी अउ सरकारी जमीन के मामला—फर्जी आदेश के खेला !
पिथौरा के जमीन घोटाला के मामला म एक कथित मास्टरमाइंड के 15 साल बाद गिरफ्तारी होय रहिस। मामला म आरोप रहिस कि फर्जी आदेश के सहारा ले 109 आदिवासी परिवार मन के जमीन अउ सरकारी जमीन बेचे के खेला होइस। ए मामला म कलेक्टर कार्यालय के रीडर के भूमिका म मदद करे के आरोप घलो सामने आए रहिस। एक अऊ  बड़खा मामला म तो 400 एकड़ जंगल जमीन तको बेचागे ।  पर जंगल हर अपन जगह म हे लेकिन करोड़ों रूपया के लेन-देन होगे , कतको बनगे ,अऊ कतको कंगाल घलो हो गे । 

अब सवाल ये हे कि अगर सरकारी फ़ाइल म फर्जी काग-जात घुस सकथे, त किसान के भरोसा आखिर काकर ऊपर टिकही ? सरकारी मुहर के इज्जत रहि जाही कि मुहर लगवइया के सेटिंग के ?

फोरलेन के मुआवजा म कई करोड़ के घपला, शासकीय पट्टे के जमीन म नियम-कानून ला किनारे करके खरीदी-बिक्री के मामला—ये सब सवाल राजस्व व्यवस्था के पारदर्शिता ऊपर गंभीर सवाल खड़ा करे रहिस । हर मामला के सच्चाई जांच अउ दस्तावेज ले तय होही, फेर जनता के सवाल ला चुप कराना अब आसान नइ हे।

सांसद के बयान—“पटवारी आईएएस, आईपीएस अउ मंत्री ले घलो बड़े!”
सांसद श्रीमती रूप कुमारी चौधरी ह एक बखत पटवारी मन के ताकत ला लेके अइसने बयान देहे रहिन कि चर्चा होय लगिस—इहाँ के पटवारी तो आईएएस, आईपीएस अउ मंत्री ले घलो बड़े!

अब ये बयान के मर्म समझव। मंत्री के आदेश बदले म फाइल घूमथे, अफसर के दस्तखत बर इंतजार होथे, फेर जमीन के रिकॉर्ड म का लिखाय हे, काकर नाम चढ़े हे अउ काकर नाम कटे हे—ये सब म पटवारी के भूमिका ला नजरअंदाज करना आसान नइ हे।

किसान के जमीन के नाप-जोख, नामांतरण, बंटवारा, नक्शा, खसरा अउ भुइयां पोर्टल के रिकॉर्ड—ये सब म पटवारी के कलम के वजन कम नइ हे। फेर जब ए अधिकार सेवा के बदला सेटिंग के औजार बन जाथे, तब जनता के मन म सवाल उठना लाजिमी हे।

बिहान के नजारा—किसान लाइन म, साहब कुर्सी म !
बिहनिया-बिहनिया किसान अपन समस्या ले पटवारी के घर-दुआरी पहुंच जाथे। कोनो के जमीन के रिकॉर्ड सुधरवाना हे, कोनो के नाम चढ़वाना हे, तो कोनो ला अपन बाप-दादा के जमीन के कागज चाही।

फेर किसान के किस्मत देखव ! वो बिहान ले अपन फाइल दबाए बइठे रहिथे। उधर पटवारी साहब नहा-धोके, अगरबत्ती जलाके, कुर्सी म विराजथें। आसपास कुछ निजी आदमी मन घलो दिख जाथें, जेमन ऊपर किसान मन ले लेन-देन के बात करे के आरोप लगत रहिथे।

अब जेन किसान के काम नियम के मुताबिक होवत हे, ओकर काम बिना अड़चन के होना चाही। फेर अगर कोनो काम म अनावश्यक देरी होवत हे अउ पैसा देय बिना फाइल नइ सरकत, त ये सेवा नइ, जनता के मजबूरी के सौदा आय।

जेन किसान के काम नियम ले हो जाथे, वो भाग्यशाली। अउ जेन किसान के फाइल टेबल म अटक जाथे, वो सरकारी दफ्तर के चक्कर काटत-काटत अपन चप्पल घिसा लेथे !

कुछ पटवारी मन के ठाठ-बाट ला देखके पिथौरा के मनखे मन आपस म कानाफूसी करथे रइथे —“भाई, ए मन के कमाई के मशीन कतेक तेज चलथे !   एक रुपया के सिक्का घलो बुलेट ट्रेन के रफ्तार म चलथे,  अऊ ” हीरा (Daimond) पहिरे के जरूरत का, जब खुदे के चमक दूरिहा ले डोंगर जैसे दिख थे !

लेकिन सवाल सिरिफ पटवारी के नइ हे। अगर कोनो अधिकारी, नेता या दूसर रसूखदार मन के संरक्षण म गड़बड़ी होवत हे, त जांच के आंच सब तक पहुंचना चाही। दोषी चाहे कतको बड़े कुर्सी म बइठे होवय, कानून के नजर म सब बराबर होना चाही।

जनता के सामने डांट-फटकार, भीतरखाना चाय-बिस्कुट !
राजनीति के रंग घलो कम मजेदार नइ हे संगवारी हो । जनता के बीच नेता जी गरजथें जरूर —“भ्रष्टाचार बर जीरो टॉलरेंस ! किसान के हक म डाका डारे वाला ला नई छोड़बो !”

जनता के सामने खरी-खोटी सुनाय के बाद भीतरखाना चाय-बिस्कुट के महफिल जमथे, ये तो सब लोगन मन जानथें। फेर जनता ए जरूर जानना चाहथे कि जमीन के हर शिकायत म निष्पक्ष जांच होवत हे कि मामला पहुंच अउ पहचान के तराजू म तौले जाथे।

बाहिर म गरियाना अउ भीतर म बतियाना—अगर अइसने राजनीति चलत होही, त किसान के न्याय के उम्मीद आखिर काकर भरोसा म रही ?

तीन घंटा म 30 लाख? सांकरा के लगे गांव के जमीन के कथित खेला !
अब सुनव एक अइसने किस्सा, जेन ह जमीन के रिकॉर्ड अउ कथित सेटिंग के पूरा खेला ला समझाय बर काफी हे। ए घटना के हर बिंदु के स्वतंत्र जांच जरूरी हे, फेर कहानी म उठे सवाल ला अनदेखा घलो नइ करे जा सके ।

सांकरा के लगे एक गांव बड़ेटेमरी म एक किसान परिवार ला शासन ले करीब पांच एकड़ जमीन के पट्टा मिले रहिस। किसान के गुजर जाए के बाद घर म ओकर पत्नी अउ एकलौता बेटा रहिगे। बेटा धीरे-धीरे नशा के लत म पड़िस अउ कर्ज म घिरत चल दिस। आखिर ओकर नजर अपन पिता के जमीन ऊपर टिक गे।

सोचिस—जमीन बेचहूं, कर्जा चुकाहूं अउ बाकी जिंदगी आराम ले काटहूं।

लेकिन जब जमीन के रिकॉर्ड भुइयां पोर्टल म देखे गिस, त जमीन सरकारी दर्ज दिखत रहिस। ग्राहक मन सरकारी जमीन समझके सौदा करे बर पीछे हट जावत रहिन। बेटा परेशान—जमीन अपन खुद के, फेर कागज म सरकारी ! अब करे त का करे ?

तभे कहानी म एक नेता जी के एंट्री होथे।
कथित तौर म नेता जी के पहुंच ले पटवारी तक बात पहुंचिस। दावा ये हे कि जेन रिकॉर्ड म जमीन सरकारी दिखत रहिस, वो कुछे समय म बदल गे। फेर एक महिला के संग सौदा होइस अउ रजिस्ट्री घलो हो गे। 

अब इहीं ले उठत हे असली सवाल—अगर जमीन के रिकॉर्ड सचमुच नियम के खिलाफ बदले गे रहिस, त बदलाव करे के आदेश कोन दिस ? जांच करे वाला अधिकारी कोन होही ? अउ रजिस्ट्री के बेरा सरकारी रिकॉर्ड के जांच कइसे होइस ?

किस्सा म दावा करे जाथे कि जमीन के मालिक ला कुछ रकम मिलिस अउ कथित नेता-पटवारी गठजोड़ के जरिए तीन घंटा के भीतर करीब 30 लाख रुपिया के फायदा के खेला होइस। फेर ये रकम काकर हिस्सा रहिस, कोन ला कतेक मिलिस अउ आरोप के सच्चाई का हे—ये सब जांच अउ प्रमाण के बिना अंतिम रूप ले नइ कहे जा सके । फेर का ये मामला के जांच -पड़ताल हो ही त जमीन हर फेर सरकारी हो जाही ।  

अगर तीन घंटा म एतका बड़ा आर्थिक खेला हो सकथे, त फेर आम किसान अपन छोटकन काम बर महीना-महीना दफ्तर के चक्कर काबर काटथे ?

किसान के जमीन के रिकॉर्ड म गलती सुधरवाय बर आवेदन, जांच, पटवारी प्रतिवेदन, तहसील के आदेश अउ कई आनी-बानी  के प्रक्रिया ! फेर रसूखदार मन के सब्बो काम हर बिजली के गति ले होथे, त जनता पूछहीच—“साहब, नियम सब्बो बर एके आय कि वीआईपी मन बर अलग खिड़की खुले हे ?”

फेर स्वागत म फटाका, माला अउ मिठाई काबर ?
अब सोचव, जेन मनखे मन किसान के जमीन, मजदूर के पसीना अउ व्यापारी के मेहनत के कमाई ले समाज म इज्जत कमाथें, वो मन का अपन मेहनत के कमई ले लाखों रुपिया के फटाका फोड़ सकथें ? फूल-माला, मिठाई अउ स्वागत-सत्कार म पानी कस पैसा बहाय सकथें ?

बड़े नेता, विधायक, मंत्री अउ सांसद के स्वागत म फटाका के लड़ी छूटथे, माला के ढेर लगथे अउ मिठाई के डिब्बा खुलथे। ये सब गलत नइ हे, अगर पैसा वैध कमई के होवय। लेकिन अगर जनता के मन म ये सवाल उठत हे कि ए ठाठ-बाट के पैसा कहां ले आवत हे, त जवाब देना घलो जरूरी हे।

किसान अपन खेत म दिनभर पसीना बहाथे। मजदूर ईंटा ढोथे। व्यापारी दिनभर दुकान म बइठथे। फेर ओ मन के मेहनत के कमाई के एक-एक रुपिया के हिसाब रहिथे। त सरकारी जमीन अउ किसान के हक के मामला म जुड़ें रसूखदार मन के संपत्ति अउ कमाई के जांच काबर नइ हो सकय ?

आखिरी सवाल—पिथौरा म जमीन के मालिक किसान आय कि रिकॉर्ड बदलइया ?
पिथौरा के जमीन संबंधी विवाद अउ कथित घोटाला अब सिरिफ कागज के मामला नइ रहिगे। ये किसान के भरोसा, सरकारी व्यवस्था के पारदर्शिता अउ प्रशासन के जवाबदेही के सवाल आय।
शासन के 1978 के पट्टा आखिर कइसे दूसर के नाम म पहुंचिस ? सरकारी तालाब के जमीन के रिकॉर्ड म हेरफेर के आरोप के सच्चाई का हे ? फोरलेन मुआवजा म बड़े बड़े घपला होइस कोन जिम्मेदार रहिस ? शासकीय पट्टे के जमीन हर बिना मंजूरी के कइसने धड़ाधड़ रजिस्ट्री होगे ? अउ कथित तौर म सरकारी रिकॉर्ड बदले के खेला म कोन-कोन के भूमिका रहिस ? ऐसे कोतको सवाल हे , ये सब्बो सवाल के आचार बनके बर्नी मा भरा गे हे ।  

इन सवाल मन के जवाब खाली बयान ले नइ, बल्कि निष्पक्ष जांच, राजस्व रिकॉर्ड के ऑडिट, रजिस्ट्री दस्तावेज के पड़ताल अउ दोषी मन ऊपर कानूनी कार्रवाई ले मिलही।

काबिल कास्त के जमीन किसान के हक आय, सरकारी तालाब जनता के संपत्ति आय अउ सरकारी रिकॉर्ड कोनो के निजी दुकानदारी नइ होय ।

पटवारी होवय, नेता होवय या बड़े अधिकारी—अगर कोनो दोषी साबित होथे, त कार्रवाई सब्बो ऊपर होना चाही। अउ अगर आरोप गलत निकलथे, त वो घलो साफ-साफ जनता के सामने आना चाही।

काबर कि जमीन के कागज म कलम के एक लकीर किसान के पीढ़ी भर के भविष्य बदल सकथे।

अंत म जनता के सवाल बस एतके हे—पिथौरा म जमीन के असली मालिक किसान रहिही, कि जमीन के रिकॉर्ड म जेनकर पहुंच अउ सेटिंग भारी, ओही मालिक बन जाही?


संगवारी हो ! जय जोहार! जय छत्तीसगढ़ महतारी ! 

🙏 मोर लेख ला मन लगाके पढ़े बर आप मन ला गाड़ा-गाड़ा धन्यवाद !

संगवारी हो, आप मन के आसपास जे भी पीड़ित, शोषित अउ अन्याय के शिकार मनखे हें, ओमन के पीरा अउ समस्या के जानकारी हम तक जरूर पहुँचावव। ओमन के आवाज बनना, ओमन के हक अउ न्याय बर लड़ना — मोर पहिली प्राथमिकता रहि। 
✊ आप मन के संगवारी अउ सेवक —
❤️ झोलटूराम (रूपानंद सोई) 94242-43631 

आप सब्बो संगवारी मन ला नवरात्रि के गाड़ा-गाड़ा बधाई अउ शुभकामना ! 🙏🚩



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