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दु:ख का एक क्षण एक साल के बराबर होता है - आचार्य देवेन्द्रसागर


धर्मसभा का आयोजन

(News Credit by Patrika)

बेंगलूरु. बसवनगुड़ी में विराजित आचार्य देवेंद्रसागर सूरी ने कहा कि जीवन में होने वाले छोटे-मोटे परिवर्तनों से सुखी एवं संपन्न व्यक्ति तो इतने प्रभावित नहीं होते जितने की दुखी,क्योंकि कहा जाता है कि दु:ख का एक क्षण एक साल के बराबर होता है।

उन्होंने कहा कि जीवन का दूसरा नाम ही समझौता है, समझौता नकारात्मक अर्थों में नहीं, अपितु सकारात्मक अर्थों में जिसका तात्पर्य है समझ एक ऐसी समझ जो सुख और दु:ख के मध्य सामंजस्य स्थापित कर सके क्योंकि जीवन उतार चढ़ाव का नाम है,

जब कभी आपकी खुशी पीक पर होती है तो आप कभी ना समाप्त होने वाले संबंधों की अपेक्षा करते हैं और जब आप दुखी होते हैं तो एक क्षण जीना भी दूभर हो जाता है, हर ओर अंधेरा ही अंधेरा नजर आता है।

वास्तव में हम सब मनुष्य हैं और पल-पल बदलने वाली भावनाओं से नियंत्रित होने वाले मन के साथ विचरण करते हैं मन की उथल-पुथल और भावनाओं के वशीभूत होकर सुख-दु:ख, सफलता असफलता, विश्वास अविश्वाश प्रेम कुंठा, क्रोध व ईष्र्या आदि के साथ जीवन पथ पर आगे बढ़ते रहते हैं और इस प्रकार नकारात्मक भावों में वृद्धि होती जाती है और हम तनिक पीड़ा से इतने व्याकुल हो जाते हैं की जीवन ही व्यर्थ लगने लगता है। 

सदैव उचित मार्ग का ही अनुसरण कीजिए, उचित मार्ग लंबा जरूर होता है परन्तु स्थाई परिणाम देने वाला होता है ,यद्यपि कई बार अत्यधिक सोच विचार कर और लम्बे रास्तों का अनुसरण करने के बाद भी उचित परिणाम प्राप्त नहीं होते, तो ऐसे में उन्हें भाग्य का लिखा मान कर स्वीकार कर लेने में और निरंतर सुधार का प्रयास करते रहने में ही संतुष्टि है।

गलती सर्वसाधारण का एक सामान्य लक्षण है समस्त संसार में ऐसा कोई मनुष्य नहीं जिससे कभी कोई भूल ना हुई हो भूल को सुधार के आगे बढ़िए क्योंकि चलते रहना ही प्रकृति का नियम है।

अंत में आचार्य ने कहा कि परिस्थिति खराब हो सकती है जीवन नहीं क्योंकि परिस्थिति तो जीवन का एक क्षण मात्र होता हे याद कीजिए ऐसी कितनी ही परिस्थितियों पर विजय पाकर आप जीवन के मार्ग में आगे बढ़े हैं इसलिए चलते रहिए बढ़ते रहिए।


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