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महासमुंद जिला न्यायालय का बड़ा फैसला : चर्च भूमि विवाद में डायोसिस ऑफ छत्तीसगढ़ की अपील खारिज




महासमुंद जिला न्यायालय का बड़ा फैसला -  चर्च भूमि विवाद में डायोसिस ऑफ छत्तीसगढ़ की अपील खारिज

महासमुंद : द्वितीय जिला न्यायाधीश महासमुंद श्री आनंद बोरकर की अदालत ने पिथौरा स्थित कथित चर्च भूमि विवाद से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में डायोसिस ऑफ छत्तीसगढ़ (सी.एन.आई.) द्वारा प्रस्तुत सिविल अपील क्रमांक H-04/2026 को खारिज कर दिया है। न्यायालय ने निचली अदालत द्वारा पारित आदेश को सही ठहराते हुए अंतरिम स्थगन (अस्थायी निषेधाज्ञा) देने से इंकार कर दिया।

मामला पिथौरा नगर के वार्ड क्रमांक 05 स्थित भूमि खसरा नं. 290/1 से संबंधित है, जहां डायोसिस ऑफ छत्तीसगढ़ ने दावा किया था कि उक्त भूमि पर आजादी से पूर्व से चर्च, प्रार्थना गृह एवं पादरी निवास स्थित है तथा संस्था वर्षों से संपत्ति कर का भुगतान कर रही है। संस्था ने आरोप लगाया था कि चंद्रप्रभाकर जोसेफ, चंद्रभूषण जोसेफ एवं प्रशील जोसेफ द्वारा विवादित भूमि पर अवैध निर्माण किया जा रहा है तथा राजस्व एवं पंजीयन अधिकारियों की मिलीभगत से दानपत्र और नामांतरण की कार्रवाई की गई है।

वहीं प्रतिवादी पक्ष की ओर से अधिवक्ता बजरंग अग्रवाल ने तर्क रखा कि चर्च संस्था के पास भूमि स्वामित्व का कोई वैध दस्तावेज नहीं है। केवल कर भुगतान की रसीदों से स्वामित्व सिद्ध नहीं होता। प्रतिवादियों ने यह भी बताया कि उनके पक्ष में विधिवत पंजीकृत दानपत्र निष्पादित हुआ है तथा नगर पंचायत द्वारा नामांतरण भी किया जा चुका है।

न्यायालय ने अपने विस्तृत 18 पृष्ठीय आदेश में कहा कि अस्थायी निषेधाज्ञा प्रदान करने के लिए आवश्यक तीनों शर्तें—प्रथम दृष्टया मामला (Prima Facie Case), सुविधा का संतुलन (Balance of Convenience) तथा अपूरणीय क्षति (Irreparable Loss)—वादी संस्था के पक्ष में स्थापित नहीं होती हैं।

अदालत ने पाया कि डायोसिस ऑफ छत्तीसगढ़ यह साबित करने में असफल रहा कि विवादित भूमि का स्वामित्व उसे किस आधार पर प्राप्त हुआ। न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि नगर पंचायत में कर भुगतान की रसीदें भूमि स्वामित्व का प्रमाण नहीं मानी जा सकतीं। इसके विपरीत प्रतिवादी पक्ष के पास पंजीकृत दानपत्र उपलब्ध है, जिसे चुनौती देने हेतु वाद में पृथक राहत भी नहीं मांगी गई है।

निर्णय में यह भी उल्लेख किया गया कि वादी संस्था यह स्पष्ट नहीं कर सकी कि वर्तमान में विवादित भूमि पर उसका वास्तविक कब्जा है अथवा प्रतिवादियों द्वारा किस हिस्से में निर्माण किया जा रहा है। ऐसी स्थिति में अस्थायी निषेधाज्ञा देने का कोई आधार नहीं बनता।

अंततः न्यायालय ने 27 फरवरी 2026 को व्यवहार न्यायाधीश, कनिष्ठ श्रेणी पिथौरा द्वारा पारित आदेश की पुष्टि करते हुए अपील को निरस्त कर दिए ।

यह निर्णय पिथौरा के चर्च भूमि विवाद में प्रतिवादी पक्ष के लिए महत्वपूर्ण कानूनी सफलता माना जा रहा है, जबकि मूल दीवानी वाद का अंतिम निर्णय अभी विचारण न्यायालय में होना शेष है।

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