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High Court Of Chhattisgarh : 33 वर्षों से अधिक समय तक चली कानूनी लड़ाई के बाद ग्रामीण को मिला सरकारी जमीन का मालिकाना हक




33 साल की कानूनी लड़ाई के बाद ग्रामीण को मिला जमीन का मालिकाना हक, अदालत ने सुनाया फैसला

Bilaspur. बिलासपुर। सरकारी जमीन पर करीब 33 वर्षों तक लगातार खेती करने और लंबी कानूनी लड़ाई लड़ने के बाद आखिरकार एक ग्रामीण को उसी भूमि का स्वामित्व अधिकार मिल गया है। बिलासपुर के 10वें जिला एवं सत्र न्यायाधीश आदित्य जोशी की अदालत ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए नारायण प्रसाद सूर्यवंशी के पक्ष में निर्णय दिया है। अदालत ने निचली अदालत के फैसले को पलटते हुए माना कि वादी ने सरकारी भूमि पर लंबे समय तक खुले, शांतिपूर्ण और निर्बाध कब्जे को साक्ष्यों के आधार पर साबित किया है। न्यायालय ने प्रतिकूल कब्जा यानी एडवर्स पजेशन के सिद्धांत के तहत नारायण प्रसाद को भूमि के स्वामित्व का अधिकार प्रदान किया।

निचली अदालत का फैसला किया गया निरस्त 
जिला न्यायालय ने बिलासपुर के 4वें सिविल जज द्वारा 3 अगस्त 2023 को दिए गए उस फैसले को निरस्त कर दिया, जिसमें नारायण प्रसाद के स्वामित्व घोषणा और स्थायी निषेधाज्ञा संबंधी वाद को खारिज कर दिया गया था। अपीलीय अदालत ने पूरे मामले में पेश किए गए दस्तावेजों, राजस्व रिकॉर्ड और अन्य साक्ष्यों का दोबारा परीक्षण किया। इसके बाद अदालत ने माना कि निचली अदालत द्वारा तथ्यों और साक्ष्यों के मूल्यांकन में त्रुटि हुई थी।

1988 से सरकारी भूमि पर था कब्जा 
मामला ग्राम सर्वन देवरी स्थित खसरा नंबर 894 की 0.340 हेक्टेयर शासकीय भूमि से जुड़ा है। जानकारी के अनुसार, इस जमीन पर नारायण प्रसाद सूर्यवंशी के पिता बिसराम वर्षों से खेती करते आ रहे थे। 30 मई 1988 को तत्कालीन नायब तहसीलदार ने उनके कब्जे को राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज किया था। पिता के निधन के बाद नारायण प्रसाद ने भी उसी भूमि पर खेती करना जारी रखा। लगातार खेती और लंबे समय तक कब्जे के आधार पर नारायण प्रसाद ने भूमि पर अपने अधिकार का दावा किया था।

वर्ष 2001 में शुरू हुआ था विवाद 
इस जमीन को लेकर विवाद वर्ष 2001 में शुरू हुआ, जब ग्राम पंचायत की ओर से भूमि पर हस्तक्षेप करते हुए पेड़ों की कटाई का प्रयास किया गया। इसके बाद नारायण प्रसाद ने कानूनी रास्ता अपनाया और मामला अदालत तक पहुंचा। विवाद की प्रक्रिया आगे बढ़ते हुए हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुंची। इसके बाद नए सिरे से दायर वाद पर अपीलीय अदालत ने सभी तथ्यों और साक्ष्यों की समीक्षा की।

अदालत ने माना 33 साल से अधिक रहा कब्जा
जिला न्यायाधीश आदित्य जोशी ने अपने फैसले में कहा कि 30 मई 1988 से 12 मई 2022 तक यानी 33 वर्ष 11 माह से अधिक समय तक भूमि पर नारायण प्रसाद का लगातार कब्जा रहा। अदालत ने कहा कि सरकारी भूमि पर प्रतिकूल कब्जे का दावा स्थापित करने के लिए निर्धारित अवधि 30 वर्ष होती है। वादी ने इस अवधि से अधिक समय तक भूमि पर शांतिपूर्ण और निर्बाध कब्जा साबित किया है। न्यायालय ने यह भी कहा कि वादी के कब्जे से जुड़े मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्यों का राज्य शासन की ओर से प्रभावी खंडन नहीं किया जा सका।
 
राजस्व रिकॉर्ड और नायब तहसीलदार के आदेश को माना अहम 
अदालत ने अपने निर्णय में कहा कि निचली अदालत ने यह मानने में गलती की कि वर्ष 1988 से पहले के कब्जे का अलग से प्रमाण देना जरूरी था। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि नायब तहसीलदार का आदेश और उसके बाद के राजस्व अभिलेख स्वयं कब्जे की पुष्टि करते हैं। इन दस्तावेजों से यह साबित होता है कि भूमि पर लंबे समय से वादी का अधिकार और कब्जा रहा है।
 
राज्य शासन को दिए गए निर्देश 
अदालत ने राज्य शासन और संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे नारायण प्रसाद सूर्यवंशी के शांतिपूर्ण कब्जे में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप न करें। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि कानून में निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना उन्हें भूमि से बेदखल नहीं किया जा सकता। इसके साथ ही अदालत ने राजस्व अभिलेखों में वादी का नाम दर्ज करने के आदेश का भी उल्लेख किया है। 33 वर्षों से अधिक समय तक चली इस कानूनी लड़ाई के बाद मिला यह फैसला नारायण प्रसाद सूर्यवंशी के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है। वहीं यह मामला प्रतिकूल कब्जे के अधिकार और सरकारी भूमि से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण न्यायिक निर्णय के रूप में देखा जा रहा है।

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